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टॉडगढ़– ग्राम परिचय

टॉडगढ़ का परिचय : पहाड़ों के बीच बसा एक सुंदर कस्बा है। टॉडगढ़ के प्रज्ञा शिखर पर खड़े होकर देखने से कई किलोमीटर दूर तक रावली का नजारा देखा जा सकता है। आज भी पर्वतीय ढलानों पर छोटे छोटे कच्चे लिपे पुते घर दिखाई दे जाते हैं। गांव की बसावट इस प्रकार से की गई है कि बारिश के दौरान यहां कीचड़ नहीं होता। राजस्थान का नया उपखंड है। प्राचीन बरसावाड़ा में राजस्थानी इतिहास पर शोध कर लिखने वाले पहले लेखक कर्नल जेम्स टॉड के नाम पर 1821 में टॉडगढ़ नाम दिया गया।

इतिहास : बरसावाडा की स्थापना करीब 1 हजार साल पूर्व की गई थी। जब यहां घना जंगल था और यहां सिर्फ जंगली जानवर बसेरा करते थे। कहा जाता है कि बरसा गुजर नाम के एक पशुपालक द्वारा यहां पशु चराए जाते रहे जिससे इस क्षेत्र को बरसावाडा कहा जाने लगा। बरसा गुजर की पत्नी चैना गुजरी द्वारा यहां बनाया गया देवजी का देवरा आज भी टॉडगढ़ में मौजूद है। बाद में मेर जाति के लोग आए। बाहुबल और छदम युद्ध पद्वति के कारण इस क्षेत्र में मेर जाति का दबदबा हो गया और गुजर लोग यहां से पलायन कर गए। मेर जाति के आतंक के कारण उदयपुर और जोधपुर के तत्कालीन शासकों ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया।

भौगोलिक स्थिति: मारवाड़ और मेवाड़ के संधि स्थल पर मेरवाड़ा का प्रमुख ग्राम समुद्री सतह से करीब 698 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। चारों और अरावली पर्वत मालाएं हैं। जिनके कारण उत्तर से आने वाली बर्फीली हवाएं और पश्चिम से आने वाली गर्म हवाएं यहां प्रभावी नहीं रहती और तापमान संतुलित बना रहता है। इसके साथ ही टॉडगढ़ प्रदूषण मुक्त क्षेत्र है।

कातर खाटी: मेवाड़ और मारवाड़ क्षेत्र को जाेड़ने के लिए वाया टॉडगढ़ होते हुए एक मार्ग निकलता है। सांप के तरह लहराती इस सड़क पर 13 यू टर्न है। आश्चर्य की बात ये है कि पहाड़ी पर ऊंचाई से इन्हें एक साथ देखा जा सकता है।

पर्यटन स्थल: दुधालेश्वर महादेव: टॉडगढ़ से महज 7 किलोमीटर दूर घने जंगलों में स्थित भगवान शिव को मंदिर। सैकड़ों सालों से मंदिर परिसर से एक स्वच्छ जलधारा निरंतर बह रही है। इसका पानी खनिज तत्वों से भरा और अत्यंत पाचक है। कहा जाता है कि यहां एक ग्रामीण पशु पालक और भगवान शिव के अनन्य भक्त खंगारजी को खुद भगवान शिव में साक्षात दर्शन दिए थे।

युनाइटेड चर्च ऑफ नार्दन इंडिया: सन 1863 में इंग्लैंड से आए ईसाई पादरी विलियम रॉब ने खिस्ती उपासना के लिए टॉडगढ़ में एक गिरजाघर बनाया। गिरजाघर में अंग्रेजी स्थापत्य कला और ईसाई संस्कृति का संगम देखने का मिलता है। प्रोटेस्टेंट ईसाईयों का ये उपासना स्थल विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी है।

टॉडगढ़ रावली वन्य जीव अभयारण्य: विश्व के प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला अरावली और तीन जिलों पाली, राजसमंद और अजमेर के 495.27 क्षेत्र में फैला है टॉडगढ़ रावली वन्य जीव अभ्यारण्य। प्रदेश का चौथा सबसे बड़ा वन्य जीव अभ्यारण्य है। इस अभ्यारण्य में चीतल, सांभर, बारहसिंगा, तेंदुआ, लकड़बग्घा, भालू, नीलगाय, भेडि़ए समेत कई अन्य जंगली जानवर देखे जा सकते हैं। इनके साथ ही मोर, तीतर, कुरजां आदि की मौजूदगी है।